उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के ड्रमंडगंज में दशहरे पर रावण के पुतले का दहन करने के बजाय उसका सिर कलम करने की अनोखी परंपरा निभाई जाती है। इस ऐतिहासिक आयोजन को देखने के लिए मिर्जापुर के अलावा प्रयागराज और मध्य प्रदेश से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।
मिर्जापुर में दशहरे की अनोखी परंपरा
देश के अधिकांश हिस्सों में विजयादशमी के दिन रावण के पुतले का दहन किया जाता है, लेकिन मिर्जापुर के ड्रमंडगंज में दशहरा मनाने का तरीका अलग है। यहां रामलीला के समापन पर भगवान श्रीराम की भूमिका निभाने वाला पात्र तलवार से रावण के पुतले का सिर कलम करता है।
यह परंपरा ड्रमंडगंज की अलग पहचान बन चुकी है। हर साल दशहरे के अवसर पर स्थानीय लोगों के साथ आसपास के जिलों से भी बड़ी संख्या में दर्शक इस आयोजन को देखने पहुंचते हैं।
तलवार से काटा जाता है रावण के पुतले का सिर
ड्रमंडगंज के दशहरा मैदान में विजयादशमी के दिन राम और रावण के युद्ध का मंचन किया जाता है। इसके बाद परंपरा के अनुसार रावण के पुतले का सिर धड़ से अलग किया जाता है।
इस आयोजन में रावण का पुतला लोहे की संरचना से तैयार किया जाता है। इसकी बनावट और सिर कलम करने की प्रक्रिया दर्शकों के लिए खास आकर्षण रहती है। सामान्य रावण दहन से अलग होने के कारण यह आयोजन क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है।
वर्षों से निभाई जा रही परंपरा
ड्रमंडगंज में रावण का सिर कलम करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। इसे स्थानीय रामलीला समिति और क्षेत्र के लोगों के सहयोग से आगे बढ़ाया जाता रहा है।
इस परंपरा की शुरुआत को लेकर अलग-अलग विवरण सामने आते हैं। इसलिए इसकी सटीक उम्र बताने के बजाय इतना कहा जा सकता है कि यह आयोजन कई पीढ़ियों से स्थानीय दशहरा उत्सव का हिस्सा रहा है।
रावण का पुतला बनाने में लगती है मेहनत
दशहरे के आयोजन के लिए रावण का पुतला तैयार करना भी एक महत्वपूर्ण काम है। कारीगर इसकी संरचना और सिर को इस तरह तैयार करते हैं कि रामलीला के दौरान सिर कलम करने का दृश्य परंपरा के अनुरूप दिखाया जा सके।
आयोजन की तैयारी पहले से शुरू हो जाती है। रामलीला समिति और कारीगर मिलकर पुतले तथा दशहरा मैदान से जुड़ी व्यवस्थाओं को अंतिम रूप देते हैं।
मेला देखने प्रयागराज और मध्य प्रदेश से भी आते हैं लोग
ड्रमंडगंज का दशहरा मेला स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी जाना जाता है। मिर्जापुर के विभिन्न इलाकों के अलावा प्रयागराज और मध्य प्रदेश से भी लोग इस अनोखी परंपरा को देखने पहुंचते हैं।
दशहरे के दिन बाजार और मेला क्षेत्र में लोगों की आवाजाही बढ़ जाती है। ऐसे आयोजनों से स्थानीय दुकानदारों, खानपान और अन्य छोटे कारोबारों को भी फायदा मिल सकता है।
इस परंपरा से जुड़ी है ड्रमंडगंज की पहचान
ड्रमंडगंज में रावण का सिर कलम करने की परंपरा विजयादशमी के आयोजन को अलग स्वरूप देती है। यह स्थानीय इतिहास, रामलीला और सामुदायिक भागीदारी से जुड़ा उत्सव है, जिसे लोग हर साल उत्साह के साथ मनाते हैं।
इस तरह मिर्जापुर का ड्रमंडगंज दशहरा अपनी विशिष्ट परंपरा के कारण जिले के प्रमुख आयोजनों में गिना जाता है।
ड्रमंडगंज की दशहरा परंपरा से जुड़े सवाल
मिर्जापुर में रावण का सिर कहां कलम किया जाता है?
यह परंपरा मिर्जापुर जिले के ड्रमंडगंज क्षेत्र में दशहरा मैदान पर निभाई जाती है।
ड्रमंडगंज में रावण का दहन क्यों नहीं किया जाता?
यहां पारंपरिक रूप से रावण के पुतले का सिर कलम करने की रस्म निभाई जाती है। यही इस क्षेत्र के दशहरा उत्सव की खास पहचान है।
रावण के सिर कलम करने का आयोजन कब होता है?
यह आयोजन विजयादशमी यानी दशहरे के दिन रामलीला के समापन पर किया जाता है।
क्या इस आयोजन को देखने दूसरे जिलों से भी लोग आते हैं?
हां, मिर्जापुर के अलावा प्रयागराज और मध्य प्रदेश सहित आसपास के क्षेत्रों से भी दर्शक इस परंपरा को देखने पहुंचते हैं।