मिर्जापुर में अब जंजीर और फीते से नहीं होगी जमीन की पैमाइश, रोवर मशीन से मिलेगी सटीक नाप

मिर्जापुर में जमीन की पैमाइश के पुराने तरीके में बड़ा बदलाव किया जा रहा है। अब जरीब और फीते की जगह सेटेलाइट आधारित रोवर मशीन से भूमि की नाप-जोख और सीमांकन किया जाएगा। यह तकनीक सेंटीमीटर स्तर तक अंतर पकड़ने में सक्षम है, जिससे जमीन से जुड़े विवादों को कम करने में मदद मिल सकती है।

जमीन की पैमाइश में आया तकनीकी बदलाव

मिर्जापुर में जमीन की नाप-जोख के लिए अब पारंपरिक तरीकों पर निर्भरता कम की जा रही है। जरीब और फीते से होने वाली पैमाइश की जगह आधुनिक सेटेलाइट आधारित रोवर तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।

नई व्यवस्था का उद्देश्य भूमि की पैमाइश को ज्यादा सटीक, तेज और तकनीक आधारित बनाना है। खास तौर पर सीमांकन और जमीन के क्षेत्रफल को लेकर होने वाले विवादों में यह तकनीक काफी उपयोगी साबित हो सकती है।

क्या है रोवर मशीन?

रोवर एक आधुनिक जीएनएसएस आधारित सर्वे मशीन है, जो सेटेलाइट से मिलने वाले सिग्नल की मदद से जमीन के अलग-अलग बिंदुओं की स्थिति निर्धारित करती है।

पारंपरिक तरीके में जमीन की दूरी नापने के लिए जरीब या फीते का इस्तेमाल किया जाता था। इसमें कई बार बड़े क्षेत्रफल की जमीन को नापने में समय लगता था और मानवीय स्तर पर छोटी-मोटी चूक की संभावना भी रहती थी।

रोवर तकनीक में जमीन के निर्धारित बिंदुओं को डिजिटल तरीके से रिकॉर्ड किया जा सकता है।

1 से 2 सेंटीमीटर तक का अंतर पकड़ने में सक्षम

इस आधुनिक मशीन की खासियत इसकी सटीकता है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक यह मशीन सेंटीमीटर और इंच स्तर तक दूरी को माप सकती है तथा लगभग 1 से 2 सेंटीमीटर तक के अंतर को भी पकड़ने में सक्षम बताई जा रही है।

ऐसी स्थिति में जमीन की सीमा को लेकर होने वाली छोटी-छोटी गलतियों का पता लगाना आसान हो सकता है।

हालांकि वास्तविक सटीकता सर्वे की परिस्थितियों, उपकरण, सेटेलाइट सिग्नल और तकनीकी प्रक्रिया पर भी निर्भर करती है।

करीब छह लाख रुपये की है मशीन

जमीन की पैमाइश में इस्तेमाल होने वाली इस रोवर मशीन की लागत करीब छह लाख रुपये बताई गई है। मशीन को निर्धारित सीमा बिंदु पर स्थापित करके भूमि की पैमाइश की जाती है।

इससे बड़े क्षेत्रफल और अनियमित आकार वाले भूखंडों का सर्वे भी अपेक्षाकृत आसानी से किया जा सकता है।

पैमाइश के साथ तैयार हो सकता है डिजिटल रिकॉर्ड

रोवर तकनीक की एक बड़ी खासियत यह है कि सर्वे के दौरान जुटाए गए आंकड़ों को डिजिटल रूप में सुरक्षित किया जा सकता है।

पैमाइश के बाद फील्ड बुक तैयार करने और उसका प्रिंट निकालने की सुविधा भी बताई गई है। इससे जमीन की नाप-जोख से जुड़े रिकॉर्ड को व्यवस्थित तरीके से रखने में मदद मिल सकती है।

जमीन के विवादों में मिल सकती है राहत

जमीन की सीमा, क्षेत्रफल और कब्जे को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर विवाद सामने आते हैं। कई मामलों में जमीन की दोबारा पैमाइश और सीमांकन की जरूरत पड़ती है।

ऐसे मामलों में आधुनिक रोवर तकनीक से पैमाइश करने पर प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और सटीक बनाने में मदद मिल सकती है। इससे राजस्व विभाग के कर्मचारियों के साथ-साथ जमीन मालिकों को भी फायदा होने की उम्मीद है।

यूपी में बढ़ रहा डिजिटल पैमाइश का इस्तेमाल

उत्तर प्रदेश में भूमि पैमाइश और सीमांकन को तकनीक आधारित बनाने की दिशा में काम चल रहा है। प्रदेश के कई क्षेत्रों में डिजी रोवर और जीएनएसएस तकनीक का इस्तेमाल शुरू किया गया है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य जमीन से जुड़े मामलों में मानवीय चूक कम करना, पैमाइश की प्रक्रिया को तेज करना और उपलब्ध आंकड़ों को डिजिटल रिकॉर्ड से जोड़ना है।

बारिश के मौसम में आ सकती है परेशानी

रोवर तकनीक कई मामलों में उपयोगी है, लेकिन मौसम का असर भी इसके इस्तेमाल पर पड़ सकता है। तेज बारिश जैसी परिस्थितियों में मशीन से सर्वे करने में परेशानी आ सकती है।

ऐसे में मौसम और फील्ड की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पैमाइश की प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है।

किसानों और जमीन मालिकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?

जमीन की पैमाइश में तकनीक के इस्तेमाल से किसानों, जमीन मालिकों और राजस्व विभाग के बीच होने वाली प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो सकती है।

खासकर उन मामलों में जहां जमीन की सीमा को लेकर विवाद हो, सटीक माप और डिजिटल रिकॉर्ड आगे की कार्रवाई में उपयोगी साबित हो सकते हैं।

आने वाले समय में भूमि रिकॉर्ड और सर्वेक्षण को डिजिटल तकनीक से जोड़ने पर जमीन से संबंधित कई प्रक्रियाओं को आसान बनाने में मदद मिल सकती है।

FAQ

मिर्जापुर में जमीन की पैमाइश के लिए अब किस तकनीक का इस्तेमाल होगा?

जमीन की पैमाइश और सीमांकन के लिए सेटेलाइट आधारित जीएनएसएस रोवर तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।

रोवर मशीन जमीन की कितनी सटीक पैमाइश कर सकती है?

उपलब्ध जानकारी के अनुसार मशीन सेंटीमीटर स्तर तक दूरी माप सकती है और करीब 1 से 2 सेंटीमीटर तक के अंतर को पकड़ने में सक्षम बताई गई है।

क्या अब जरीब और फीते से जमीन नहीं नापी जाएगी?

नई तकनीक के इस्तेमाल से पारंपरिक जरीब और फीते पर निर्भरता कम की जा रही है। हालांकि किसी मामले में कौन-सी प्रक्रिया अपनाई जाएगी, यह संबंधित राजस्व प्रक्रिया और अधिकारियों पर निर्भर करेगा।

रोवर मशीन की कीमत कितनी है?

इस तरह की रोवर मशीन की लागत करीब छह लाख रुपये बताई गई है।

जमीन की पैमाइश में रोवर तकनीक का क्या फायदा है?

इससे जमीन की नाप-जोख अधिक सटीक तरीके से करने, डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने और सीमांकन से जुड़े विवादों के निस्तारण में मदद मिल सकती है।

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